Thursday, 6 January 2011

मेरी सुबह

हल्का हल्का घुलता अँधेरा।
रात की काली स्याही मानो,
भोर की नीली से घुल रही हो।
पौ फटने में अभी कुछ देर थी,
दिन के पहले परिंदे मगर,
सूरज की अगवाही करने
अपने घोंसलों से निकल चुके थे-
कुछ मीठी चहचहाहट
तो कुछ तीखी चीख के साथ।

दिसंबर अपने आखरी दिन गिन रहा था,
और जनवरी बस पहुंचने को था।
बंद खिड़की के ठन्डे कांच को,
सुबह की मुलायम पहली धुप
अपनी गर्माहट दे रही थी।
रात भर शरीर से सिकी रज़ाई
में लिपटे गर्म तकिये पर पड़े पड़े
मेरी आँखें खुलने से नाराज़ हो रहीं थी।
रोशनदान से धुप की एक किरण
आकर सीधे चेहरे पे पड़ी,
तो आँखों की ज़िद टूटी।

मैं अपनी बाईं करवट पे था
और मेरे सामने बदलियों से आधा छिपा,
अपनी दाईं करवट पे चाँद सो रहा था।
वो बंद पलकें,
वो भीनी भीनी सांसें,
वो हल्क़े खुले होंठ।
मेरा वक़्त जैसे वहीँ थम गया।
न धूप की तपिश,
न वो धीरे धीरे हटता कोहरा,
और न ही चिड़ियों का शोर।
मासूम सी नींद मै सोया,
सिर्फ वो एक चेहरा।
और एक टक उसे ताकता,
अपनी दाईं करवट पे लेटा-
मैं।
फिर धीरे से वो आँखें खुली,
और मुझे इस तरह देखकर
वो होंठ हौले से मुस्कुराए।

अब धूप खिल गई है,
और सुबह भी मेरी अब आई है।



3 comments:

coloured passengeR said...

kya baat hai! agli baar script likhoonga to scene establish tumhi se karvaoonga! lage raho !

K Harish Singh said...

Lovely details

S PRADHAN said...

Nice metaphors !