पुनम की बासी रात थी,
चाँद मगर,
ताज़ी सिकी रोटी सा,
रात की थाली पर सजा हुआ था.
आँगन के आम की परछाई,
बरामदे की मेज़ पर पड़ रही थी.
एक झींगुर की आवाज़ के अलावा,
कोई भी शोर नहीं था.
उस परछाई से छींटे बरामदे पर,
अपनी आँखे बंद किये अकेला,
मैं उस चाँद को ताक रहा था.
आज से पहले, चाँदनी से कभी,
माँ की रोटियों की खुशबु नहीं आई थी.