Wednesday, 6 October 2010

दौड़

नंगे पाँव, फटी एड़ियां
तलवों से उड़ती
कपड़ों पर सनी
सूखी, प्यासी
पीली धुल।

मैं, मगर
दौड़ना नहीं छोड़ूंगा।

धुप में चुन्धियाई आँखें,
रूकती थकती सांस,
ख़त्म होता पसीना,
ज़ख्मों पर जमा
सूखा काला खून।

मैं फिर भी,
दौड़ना नहीं छोड़ूंगा।

झल्लाया मन,
टूटता हौसला,
गुज़रती उम्र,
नाउम्मीदी की हद छूता
थका हुआ दिल।

मैं अब भी मगर,
दौड़ना नहीं छोड़ूंगा।

क्योंकि,
इस रेगिस्तान की
सूखी दौड़ के पार-
कहीं पानी बरसता है।

Friday, 28 May 2010

पुनम की बासी रात

पुनम की बासी रात थी,
चाँद मगर,
ताज़ी सिकी रोटी सा,
रात की थाली पर सजा हुआ था.
आँगन के आम की परछाई,
बरामदे की मेज़ पर पड़ रही थी.
एक झींगुर की आवाज़ के अलावा,
कोई भी शोर नहीं था.
उस परछाई से छींटे बरामदे पर,
अपनी आँखे बंद किये अकेला,
मैं उस चाँद को ताक रहा था.
आज से पहले, चाँदनी से कभी,
माँ की रोटियों की खुशबु नहीं आई थी.

Wednesday, 14 April 2010

कदम

गीली, खारी, हल्की ठंडी,
मुलायम, महीन
किनारे की रेत.
बहुत देर से इस पर टेहेल रहा हूँ.
अपने कदम अपने पीछे,
एक एक कर छोड़ रहा हूँ.
वो पर देर तक नहीं टिकते.
लहर उन्हें अपने दामन मे
समेट अपने साथ ले जाती है.
चाहता था कुछ कदम
अपने साथ ही रखूं.
सो टेहेलना छोड़ वहीँ खड़ा हो गया.
लहर हमेशा की तरह आई
और मेरे पैरों के नीचे से.
मेरे कदम फिर ले गयी.
बड़ी देर तक खड़ा रहा,
पर अपने क़दमों को,
लेहेरों के साथ जाने से
रोक न सका.

लम्बी सान्स भरी,
और फिर आगे टहलने चला.
चलते चलते फिर,
अपने कदम अपने
पास रखने का मन हुआ.
सामने देखा, मुलायम रेत के बीच,
एक सख्त चट्टान थी.
इस बार अपने कदम
उस चट्टान पर जमाए.

यूँ लगा जैसे,
टहलते टहलते कहीं अचानक,
ठंडी छाओं मिल गयी हो.
एक सुहावना सा ठेहेराव आ गया हो,
मन कहने लगा था,
अब बस यहीं पड़ाव डाल लो.
और मै भी ये बात
मानने की सोचने लगा था.

लहर को पर ये मंज़ूर न था.
बड़ी मुद्दत से मेरे कदम उसे नहीं मिले थे,
तैश मे आ वो उस चट्टान से
टकराके कुछ यूँ उठी,
के मुझे धकेल के आगे फ़ेंक दिया.

इस किनारे कोई पलट नहीं सकता,
मुझे भी आगे बढ़ना ही पड़ा.
लहर फिर मेरे रेतीले कदम
अपने दामन मे समेटने लगी है.

मगर मेरे वो पथरीले कदम
अब भी उस चट्टान पर हैं.
उन्हें समेटने मे,
अभी काफी वक़्त लगेगा.

मन हल्का सा भारी बोझ

एक पत्ता था मैं सूखा सा,
बस टूट अभी गिर रहा था मैं। 

फिर बही कहीं से ठंडी हवा,
उस हवा में उड़ने लगा था मैं। 

आकाश का थोडा नील चुराया,
धरा की थोड़ी हरियाली। 
कोयल को भी गीत सुनाया,
नाच मोर को दी ताली। 

उस तेज़ हवा में पूर्ण विलीन,
था स्वच्छ उन्माद उल्लास उमंग। 
मन में लिए वो प्रणय नवीन,
थी विरल विचित्र विस्मित तरंग। 

सहसा वेग शिथिल हुआ,
लगा, हवा कुछ हिचकिचाई। 
पत्ता मैं भूमि पर आया,
स्थिति ये जाने क्यों आई। 

हवा कुछ हल्की तीव्र हुई,
मैं मन ही मन हर्षाया। 
वो शीघ्र शिखर से गुज़र गयी,
पर मैं पर्वत से टकराया। 

अब बस और नहीं है उड़ना,
न करूँगा किसी हवा की खोज। 
थक गया हूँ मै, उस से कहना,
है मन हल्का सा भारी बोझ। 

Sunday, 4 April 2010

Saath


Samandar ke seene pe
Machalti itraati
Besabr baahen pasaare
Leher,
Apne saahil se milne
Nikal padi hai.

Wo janti hai-
Saahil uski agwahi ke liye
Kuch alag nahi karega
Wo na machlega na hi sabr khoyega
Na hi wo use bahen pasare milega.
Aur usi sahil se takrake
Use boond boond bikhar jana hai.

Magar wo ye bhi janti hai-
Ki wo nishcal, adig, anant,
Amar sa saahil
Humesha uska intezaar karega.
Uski har khushi, har gham baantega.
Uske har mijaaz ke saath,
Bina shikayat nibhaega

Har mulaqat pe,
Saahil apne jism ka kuch
Leher ko tohfe mein deta hai.
Wo kehti-
“Hamesha kyon?
Dekho jism pe tumhare,
Suraakh ho chale hain.”

Muskurate hue saahil jawab deta hai-
“Arey ye suraakh kahan,
Main to jagah bana raha hoon.
Jab bhi milne aati ho tum,
Tum bhi to kuch kuch inme,
Mere paas ruk jaati ho.
To jitna khudko tumhe doonga,
Tum utna hi mere paas rukti jaogi.
Thoda hi sahi,
Par tumhare utne saath se,
Mera adhura jism mukkamal mehsoos hota hai.

Aur fir ek roz jab,
Apne jism ka akhri katra tumhe de doonga,
Tum main aur main tum ho jaunga.
Ik dooje mei samajane se badhkar,
Bhala koi saath hua hai kabhi.