Monday, 21 March 2011

नन्हे ख्वाब


My good friend Shivani is from Kashmir. She was a little girl when she left Kashmir for Delhi with her family. Before she left, as a token of remembarance, she took with her a fistful of earth from her garden which she still has with her. This touching moment of hers gave me inspiration for this poem. Even though this is not exactly what Shivani experienced, I took some creative liberties to make my own character and her story.


नन्हे ख्वाब

नम आँखों में बंद,
कुनकुने नमकीन से,
चमकते पानी से साफ़,
कुछ नन्हे ख्वाब हैं।


बाग़ में जो छोटा चिनार है,
उसे बड़ा होते देखूं।
हरी दीवारों की उस रसोई में,
माँ से कहवा बनाना सीखूं।
चाचा के फूलों के शिकारे को,
खुद से दल पर ले जाऊं।
अपने कमरे की जो छोटी खिड़की है,
उसके परदे अपने हाथों से बनाऊँ।
पड़ोस के अश्रफ और सलमा संग,
कुछ और दिवाली और ईद मनाऊँ।
बरामदे में दादाजी के साथ बैठकर,
सबके लिए कांगड़ीयाँ बनाऊँ।
और बड़ी होकर बाबा की नीली जीप,
पुरे शहर में गोल गोल घुमाऊँ।


बाग़ की सीली मिट्टी पर नंगे पाँव खड़े,
टकटकी बांधे अपने घर को देख रही थी।
ये ख्वाब सारे,
किसी बायोस्कोपे की फिल्म की तरह,
आँखों के सामने से दौड़ गए।

बाबा कहते हैं,
ये शहर अब अपना नहीं रहा।
वो कहते हैं,
ये शहर अब किसीका नहीं रहा।
यहाँ अब सिर्फ धमाके रहते हैं,
सिर्फ मातम, सिर्फ चीखें।
मैं ये बातें नहीं समझती,
पर ये ज़रूर देखा है-
बाबा और हस्ते नहीं,
माँ भी कम बोलती है आज कल।
वो कहते हैं हम ये शहर छोड़ रहे हैं।
अपना घर छोड़ रहे हैं।

पैरों की उँगलियों में मिट्टी नोचते,
मैं ये सोच रही थी-सब जा रहे हैं,
अश्रफ सलमा भी गए,
अपना सब छोड़कर वो,
गए।
मुझे भी सब यहाँ छोड़ना पड़ेगा?
वो चिनार, वो बगीचा,
वो शिकारा, वो कहवा,
वो ईद, वो दिवाली,
वो खिड़की, वो कांगड़ी,
सब वो मेरे ख्वाब,
यहीं छोड़ने पड़ेंगे?


पैरों तले नुची बाग़ की मिट्टी,
उठाकर मुट्ठी में भर ली,
हर ख्वाब से चुटकीभर धूल समेट,
उस मुट्ठीभर मिट्टी में,
मिलाई फिर संभलकर अपने रुमाल में,
एक पोटली सी बनाई।


बरसों बाद आजवो पोटली लिए बैठी हूँ।
नम आँखें छलक पड़ीं,
और एक बूँद,
उस पोटली पे जा गिरी।
उस मिट्टी से आज भी,
उन नन्हे ख़्वाबों की महक आती है.