Sunday, 10 July 2011

इन सफहों पे

कुछ कोरे सफहे निकाले कि शायद इक नज़्म लिखूं,
सालों पहले साथ गुज़ारी जाड़ों की वो बज़्म लिखूं.
शायद उस नाज़-ओ-हयात में लिपटी इक ग़ज़ल लिखूं,
सोचता हूँ इन सफहों पे आज मैं, इश्क-ए-अज़ल लिखूं.


गर्म साँसों से सिके वो गुलाबी रुखसार लिखूं,
किसी सुबह की अलसाई सैर का बाग़-ए-गुलज़ार लिखूं.
मुमकिन है इक शरारत के ख़ास-ओ-अंदाज़ लिखूं,
सोचता हूँ इन सफहों पे आज मैं वो हँसते साज़ लिखूं.


हमकदम हो पहुंचे कुछ मंज़िल-ओ-मुक़ाम लिखूं,
हमसफ़र हो गुज़रे जो वो राह-ए-तमाम लिखूं.
कोशिश करूँ के चंद छलके आब-ओ-शार लिखूं,
सोचता हूँ इन सफहों पे आज मैं, इंतज़ार लिखूं.


हर आह पे धड़कता ये दिल-ए-नादाँ लिखूं,
मुझ मुन्तज़िर पे किया इक हसीं एहसाँ लिखूं.
जानता नहीं क्या आग़ाज़, क्या अंजाम लिखूं,
सोचता हूँ इन सफहों पे आज मैं, सिर्फ तुम्हारा नाम लिखूं.



सफहे- pages/ leaves of paper ; नज़्म- a poetic verse ; बज़्म- a musical evening, a 'mehfil' ; नाज़- grace ; हयात- shyness/blushing ; अज़ल- eternal ; रुखसार- cheeks ; अलसाई- lazy ; गुलज़ार- garden of flowers ; मुक़ाम- destination ; तमाम- all/ in completion ; आब-ओ-शार- water springs, here it's a metaphor for tears ; मुन्तज़िर- one who has waited ; आग़ाज़- beginning ; अंजाम- end
Me and my friend Meha were talking about Kaifi Azmi ji's work and the beauty of Urdu last night. I happened to mention some of the words he'd used in his poems and she came up with this phrase- 'क़स्र ओ क़फ़स' and it set me thinking and eventually writing. The following शायरियाँ (if they can be called so) are a result of that momentum. Thanks Meha for setting me off and bearing with me as they came!


"था क़स्र-ओ-क़फ़स में क़ैद जो रहनुमा मेरा,
दिखता है आज कल बस एक चांदी के अक्स में. "
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" वो रुखसार जो उँगलियों पे ग़ुलाब से लगते थे ,
उन्हें छूने को अब हम ख़त लिखा करते हैं.
अल्फाज़ों में अपने लबों की कुछ गर्मी लपेटे,
वो अपने माइके से हमें जवाब लिखा करते हैं. "
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" कुछ ख़ाक बटोरके मैंने एक पोटली उसकी बनाई है,
कि वो राह गुज़रते तुम्हारे घरको जाती है.
फिर बरसात जब उस पोटली से महक उठती है,
उस महक में मुझे तुम्हारी याद सी आती है. "
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" कल बाज़ार से गुज़रते एक खुशबू से टकराए थे,
आज सीढियों पे उस खुशबू ने पाज़ेब पहनी थी.
कल दफ्तर के बहार वो शायद दुपट्टे में लिपटी मिले,
वो यूँ करे परसों खुशबू खुद चलके घर आ जाएगी. "
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" कुछ घंटों से पिछले, मेरे हाथ में इक क़िताब है,
शायद इसलिए नाराज़ मुझसे मेरा महताब है,
प्याली-तश्तरी पटकी और कहा सुनाई देता हो तो सुनो,
छुट्टी अपनी मूई क़िताब संग गुज़ारना,मुझे आज बहुत काम है. "
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" बरामदे की धुप पर बादल छा रहे थे,
हवा पे सवार बाग़ के सूखे पत्ते लहरा रहे थे.
मौसम बेशक़ अब बदल ही रहा था क्योंकि,
अपनी बरसाती चप्पल पहने तुम जो आ रहे थे. "
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“ इम्तिहाँ और इन्तेहा में चंद हर्फों का फर्क है,
एक मज़ार-ए-कैस तो एक ताज-ए-क़स्र है. "

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क़स्र- palace ; क़फ़स- prison ; रहनुमा- guide/leader ; अक्स- reflection ; रुखसार- cheeks ; अल्फाज़- words ; ख़ाक- earth as in 'mitti' ;  महताब- moon ; इम्तिहाँ- test/ examination/ judgement ; इन्तेहा- limit/ extent ; हर्फ- letters of a word/ alphabet ; मज़ार-ए-कैस- tomb of Qais or Majnun ; ताज-ए-क़स्र- The Taj Mahal

Sunday, 22 May 2011

चौखट की ख़ाला

ज़माने की आस लिए
चौराहे को ताकते,
चौखट पे बैठी वो ख़ाला,
अब काफी पुरानी हो चुकी थी.
कोई उम्र पूछे तो
लोग पीढ़ियों में बताते थे.

जिस्म पुराने खंडहरों सा
सूखा खोखला हो चूका था.
भूख प्यास जैसे सिर्फ
बेमानी लव्ज़ ही रह गए थे.
अल्फाज़ जो सिर्फ सुनाई देते,
मग़र महसूस होते अब
एक अरसा बीत चुका था.
कभी कोई भलामना कुछ खिला जाता,
कोई कटोरी में कभी पानी डाल जाता.

जो मिला वो लिया,
पर किसीसे कभी कुछ न माँगा.
मोहल्ले के नए लोग उन्हें
भिखारन समझ बैठते.
पर वो थीं नहीं-
वो सिर्फ उस चौखट पे बैठे
चुपचाप एक टक
चौराहे की ओर ताकते रहती.

कब सोए, कब जागे,
न किसी ने देखा,
न कोई जानता था.
भूख, प्यास, उम्र, वक़्त
जैसे उस चौखट पे आकर
अपने मायने भूल जाते थे.

वहां से गुज़रता हर शक्स,
अचानक खुदबखुद खामोश हो जाता.
जैसे वो सन्नाटा उन्हें
कहीं अन्दर छूं गया हो.
ये कोई भयानक सन्नाटा नहीं था,
बल्कि किसी गहरे अकेलेपन, किसी
बेहद से इंतज़ार का सन्नाटा था.

वहां के बुज़ुर्ग कहते,
ख़ाला के बेटे ने कभी,
उस चौराहे से गाड़ी पकड़ी थी.
हर हफ्ते ख़त आते,
जिन्हें डाकिया पढ़ जाता था.
हफ्ते के दो हफ्ते,
फिर महीने, उनके साल
और अब उन सालों के
कुछ ज़माने हो गए थे.
न ख़त, न खबर, और न ही वो.

गहरी महीन झुर्रियों से घिरी,
खाला की धुंधलाई सूखी आखें मग़र,
अब भी शायद चौराहे की उस गाड़ी की
उम्मीद पे जिंदा थीं.
वो गाड़ी आ जाये तो-
सूखी आँखे कुछ नम हों,
थकी पलकों को आराम मिले,
जिस्म सुकूं की सांस ले
और उस चौराहे पर से
उस चौखट का पहरा,
हमेशा के लिए उठ जाए.

Monday, 21 March 2011

नन्हे ख्वाब


My good friend Shivani is from Kashmir. She was a little girl when she left Kashmir for Delhi with her family. Before she left, as a token of remembarance, she took with her a fistful of earth from her garden which she still has with her. This touching moment of hers gave me inspiration for this poem. Even though this is not exactly what Shivani experienced, I took some creative liberties to make my own character and her story.


नन्हे ख्वाब

नम आँखों में बंद,
कुनकुने नमकीन से,
चमकते पानी से साफ़,
कुछ नन्हे ख्वाब हैं।


बाग़ में जो छोटा चिनार है,
उसे बड़ा होते देखूं।
हरी दीवारों की उस रसोई में,
माँ से कहवा बनाना सीखूं।
चाचा के फूलों के शिकारे को,
खुद से दल पर ले जाऊं।
अपने कमरे की जो छोटी खिड़की है,
उसके परदे अपने हाथों से बनाऊँ।
पड़ोस के अश्रफ और सलमा संग,
कुछ और दिवाली और ईद मनाऊँ।
बरामदे में दादाजी के साथ बैठकर,
सबके लिए कांगड़ीयाँ बनाऊँ।
और बड़ी होकर बाबा की नीली जीप,
पुरे शहर में गोल गोल घुमाऊँ।


बाग़ की सीली मिट्टी पर नंगे पाँव खड़े,
टकटकी बांधे अपने घर को देख रही थी।
ये ख्वाब सारे,
किसी बायोस्कोपे की फिल्म की तरह,
आँखों के सामने से दौड़ गए।

बाबा कहते हैं,
ये शहर अब अपना नहीं रहा।
वो कहते हैं,
ये शहर अब किसीका नहीं रहा।
यहाँ अब सिर्फ धमाके रहते हैं,
सिर्फ मातम, सिर्फ चीखें।
मैं ये बातें नहीं समझती,
पर ये ज़रूर देखा है-
बाबा और हस्ते नहीं,
माँ भी कम बोलती है आज कल।
वो कहते हैं हम ये शहर छोड़ रहे हैं।
अपना घर छोड़ रहे हैं।

पैरों की उँगलियों में मिट्टी नोचते,
मैं ये सोच रही थी-सब जा रहे हैं,
अश्रफ सलमा भी गए,
अपना सब छोड़कर वो,
गए।
मुझे भी सब यहाँ छोड़ना पड़ेगा?
वो चिनार, वो बगीचा,
वो शिकारा, वो कहवा,
वो ईद, वो दिवाली,
वो खिड़की, वो कांगड़ी,
सब वो मेरे ख्वाब,
यहीं छोड़ने पड़ेंगे?


पैरों तले नुची बाग़ की मिट्टी,
उठाकर मुट्ठी में भर ली,
हर ख्वाब से चुटकीभर धूल समेट,
उस मुट्ठीभर मिट्टी में,
मिलाई फिर संभलकर अपने रुमाल में,
एक पोटली सी बनाई।


बरसों बाद आजवो पोटली लिए बैठी हूँ।
नम आँखें छलक पड़ीं,
और एक बूँद,
उस पोटली पे जा गिरी।
उस मिट्टी से आज भी,
उन नन्हे ख़्वाबों की महक आती है.

Wednesday, 12 January 2011

फुर्सत

हवादार बालकॉनी ,
पत्तों की सरसराहट,
रात की स्याही पर ,
बादलों में पोशीदा ,
गोल दूधिया चाँद।

है फुर्सत की दावत।

मगर इस मसरूफियत के चलते ,
फुर्सत भी हमारी हीरा हो गयी है।

पहली बारिश

हल्के झोंकों में हिलते पत्तों पे,
वो मद्धम ठंडी सी बूँदें जब,
अपनी ही एक अलग सरगम छेड़ती हैं,
जब बादल अपनी गहरी गरज से
उनसे अपनी अलग ताल मिलाता है,
तब कुदरत अपनी ये,
सदियों पुरानी बंदिश,
इस नए राग में गाती है ।
पहली बारिश देखो कुछ यूँ आती है।

Thursday, 6 January 2011

मेरी सुबह

हल्का हल्का घुलता अँधेरा।
रात की काली स्याही मानो,
भोर की नीली से घुल रही हो।
पौ फटने में अभी कुछ देर थी,
दिन के पहले परिंदे मगर,
सूरज की अगवाही करने
अपने घोंसलों से निकल चुके थे-
कुछ मीठी चहचहाहट
तो कुछ तीखी चीख के साथ।

दिसंबर अपने आखरी दिन गिन रहा था,
और जनवरी बस पहुंचने को था।
बंद खिड़की के ठन्डे कांच को,
सुबह की मुलायम पहली धुप
अपनी गर्माहट दे रही थी।
रात भर शरीर से सिकी रज़ाई
में लिपटे गर्म तकिये पर पड़े पड़े
मेरी आँखें खुलने से नाराज़ हो रहीं थी।
रोशनदान से धुप की एक किरण
आकर सीधे चेहरे पे पड़ी,
तो आँखों की ज़िद टूटी।

मैं अपनी बाईं करवट पे था
और मेरे सामने बदलियों से आधा छिपा,
अपनी दाईं करवट पे चाँद सो रहा था।
वो बंद पलकें,
वो भीनी भीनी सांसें,
वो हल्क़े खुले होंठ।
मेरा वक़्त जैसे वहीँ थम गया।
न धूप की तपिश,
न वो धीरे धीरे हटता कोहरा,
और न ही चिड़ियों का शोर।
मासूम सी नींद मै सोया,
सिर्फ वो एक चेहरा।
और एक टक उसे ताकता,
अपनी दाईं करवट पे लेटा-
मैं।
फिर धीरे से वो आँखें खुली,
और मुझे इस तरह देखकर
वो होंठ हौले से मुस्कुराए।

अब धूप खिल गई है,
और सुबह भी मेरी अब आई है।