Sunday, 22 May 2011

चौखट की ख़ाला

ज़माने की आस लिए
चौराहे को ताकते,
चौखट पे बैठी वो ख़ाला,
अब काफी पुरानी हो चुकी थी.
कोई उम्र पूछे तो
लोग पीढ़ियों में बताते थे.

जिस्म पुराने खंडहरों सा
सूखा खोखला हो चूका था.
भूख प्यास जैसे सिर्फ
बेमानी लव्ज़ ही रह गए थे.
अल्फाज़ जो सिर्फ सुनाई देते,
मग़र महसूस होते अब
एक अरसा बीत चुका था.
कभी कोई भलामना कुछ खिला जाता,
कोई कटोरी में कभी पानी डाल जाता.

जो मिला वो लिया,
पर किसीसे कभी कुछ न माँगा.
मोहल्ले के नए लोग उन्हें
भिखारन समझ बैठते.
पर वो थीं नहीं-
वो सिर्फ उस चौखट पे बैठे
चुपचाप एक टक
चौराहे की ओर ताकते रहती.

कब सोए, कब जागे,
न किसी ने देखा,
न कोई जानता था.
भूख, प्यास, उम्र, वक़्त
जैसे उस चौखट पे आकर
अपने मायने भूल जाते थे.

वहां से गुज़रता हर शक्स,
अचानक खुदबखुद खामोश हो जाता.
जैसे वो सन्नाटा उन्हें
कहीं अन्दर छूं गया हो.
ये कोई भयानक सन्नाटा नहीं था,
बल्कि किसी गहरे अकेलेपन, किसी
बेहद से इंतज़ार का सन्नाटा था.

वहां के बुज़ुर्ग कहते,
ख़ाला के बेटे ने कभी,
उस चौराहे से गाड़ी पकड़ी थी.
हर हफ्ते ख़त आते,
जिन्हें डाकिया पढ़ जाता था.
हफ्ते के दो हफ्ते,
फिर महीने, उनके साल
और अब उन सालों के
कुछ ज़माने हो गए थे.
न ख़त, न खबर, और न ही वो.

गहरी महीन झुर्रियों से घिरी,
खाला की धुंधलाई सूखी आखें मग़र,
अब भी शायद चौराहे की उस गाड़ी की
उम्मीद पे जिंदा थीं.
वो गाड़ी आ जाये तो-
सूखी आँखे कुछ नम हों,
थकी पलकों को आराम मिले,
जिस्म सुकूं की सांस ले
और उस चौराहे पर से
उस चौखट का पहरा,
हमेशा के लिए उठ जाए.

5 comments:

K Harish Singh said...

Nice. Loved this... "Umr peedhiyon mein!"

coloured passengeR said...

aur phir us chaurahe par se
us chaikhat ka pehra..uth sake!

jab ye baat sach ho jaye to mujhe zaroor wahan le chalna, ek baar dekhna chahunga, us chaukhat ki garmahat mahsoos karna chahunga..

bahut khoob!

nk said...

Tumhari kavitaayen dil se gujarte hue aakhon tak aati hai aur unhe chhalchhalaa deti hai.

Shilpa Das said...

agree with harish: "umr peedhiyon mein"...is one of the most beautiful lines i have ever read :)

Sanjay said...

Sirji, brilliant. Agree with Harish and Shilpa. What a line, that.