Wednesday, 14 April 2010

कदम

गीली, खारी, हल्की ठंडी,
मुलायम, महीन
किनारे की रेत.
बहुत देर से इस पर टेहेल रहा हूँ.
अपने कदम अपने पीछे,
एक एक कर छोड़ रहा हूँ.
वो पर देर तक नहीं टिकते.
लहर उन्हें अपने दामन मे
समेट अपने साथ ले जाती है.
चाहता था कुछ कदम
अपने साथ ही रखूं.
सो टेहेलना छोड़ वहीँ खड़ा हो गया.
लहर हमेशा की तरह आई
और मेरे पैरों के नीचे से.
मेरे कदम फिर ले गयी.
बड़ी देर तक खड़ा रहा,
पर अपने क़दमों को,
लेहेरों के साथ जाने से
रोक न सका.

लम्बी सान्स भरी,
और फिर आगे टहलने चला.
चलते चलते फिर,
अपने कदम अपने
पास रखने का मन हुआ.
सामने देखा, मुलायम रेत के बीच,
एक सख्त चट्टान थी.
इस बार अपने कदम
उस चट्टान पर जमाए.

यूँ लगा जैसे,
टहलते टहलते कहीं अचानक,
ठंडी छाओं मिल गयी हो.
एक सुहावना सा ठेहेराव आ गया हो,
मन कहने लगा था,
अब बस यहीं पड़ाव डाल लो.
और मै भी ये बात
मानने की सोचने लगा था.

लहर को पर ये मंज़ूर न था.
बड़ी मुद्दत से मेरे कदम उसे नहीं मिले थे,
तैश मे आ वो उस चट्टान से
टकराके कुछ यूँ उठी,
के मुझे धकेल के आगे फ़ेंक दिया.

इस किनारे कोई पलट नहीं सकता,
मुझे भी आगे बढ़ना ही पड़ा.
लहर फिर मेरे रेतीले कदम
अपने दामन मे समेटने लगी है.

मगर मेरे वो पथरीले कदम
अब भी उस चट्टान पर हैं.
उन्हें समेटने मे,
अभी काफी वक़्त लगेगा.

2 comments:

Anonymous said...

"Magar mere wo pathrile kadam...." I loved these lines the most...
Nice one..!

K Harish Singh said...

“Chahta tha kuch kadam apne sath hi rakhoon…”
Simply beautiful!